(Part-2)The great war of Sikh history सिख इतिहास का महायुद्ध

https://myrataul.com

https://myrataul.com/the-great-war-of-sikh-history-(1-part) ……..मुगल जरनैल नाहर खान ने सीडी लगाकर गढ़ पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु गुरुदेव ने उसको वही बाणों से भेद कर चित कर दिया। सरहिंद के नवाब ने सेनाओं को एक बार फिर इकट्ठा होकर कच्ची गढ़ी हवेली पर पूरी ताकत से आक्रमण करने का आदेश दिया। किंतु गुरु महाराज ऊंचे टीले वाली हवेली में होने के कारण सामरिक दृष्टि से अच्छी स्थिति में थे। तो उन्होंने यह आक्रमण भी विफल कर दिया सिखों के जत्थे ने गढ़ से बाहर आकर मुगल सेना पर करारे प्रहार कीये। गाड़ी के ऊपर लगे ध्वज केसरी से गुरु महाराज खुद अपनी योद्धाओं की सहायता शत्रुओं पर बाण चलाकर कर रहे थे। गढ़ी पर खूब लोहे पर लोहा बजा। सैकड़ों शत्रु सैनिक मैदान में देर हो गये। अंत तक पांचों सिख भी शहीद हो गए। एक बार फिर गुरु महाराज ने 5 सिखों का दूसरा जत्था गढ़ी से बाहर रणभूमि में भेजा। इस जत्थे ने भी आगे बढ़ते हुए शत्रुओं के छक्के छुड़ाए और उन को पीछे धकेल दिया। और शत्रुओं का भारी नुकसान करते हुए वीरगति पा गए। इस प्रकार गुरुदेव ने रणनीति बनाई और 5-5 के जत्थे बारी-बारी रणभूमि में भेजने लगे। जब पांचवा जत्था भी शहीद हो गया तो दोपहर का समय हो चुका था।

सूरज माथे पर चढ़ आया था, सरहिंद के नवाब वजीर खान की हिदायत ओं का पालन करते हुए शत्रु सेना के 8 सेनापतियों ने अपनी सेनाओं के साथ गढ़ की ओर बढ़ना शुरू किया। अब सिख सैनिकों को लगने लगा कि एक साथ इतना बड़ा हमला रोक पाना मुश्किल होगा। इस कारण अंदर बाकी बचे सिखों ने गुरु महाराज से प्रार्थना की कि वह साहिबजादो के साथ युद्ध भूमि से बाहर निकल जाए। यह सुनकर गुरु महाराज ने सिखों से कहा तुम कौन से सहिबजादो की बात करते हो। तुम सभी भी तो मेरे साहिबजादे हो। गुरुदेव जी का यह उत्तर सुनकर सभी आश्चर्य में पड़ गए। गुरु महाराज के बड़े सुपुत्र अजीत सिंह पिता जी से युद्ध भूमि में जाने का आदेश मांगने लगे। गुरु महाराज ने तुरंत आशीष दी और अपना कर्तव्य पूर्ण करने को प्रेरित किया। बड़े साहिबजादा अजीत सिंह के मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा था। बस फिर क्या था वह अपने चार अन्य सिखों को लेकर घर से बाहर चले गए और मुगलों की सेना पर ऐसे टूट पड़े।अजीत सिंह जीदर बढ़ जाते उधर सामने आने वाले सैनिक गिरते पड़ते और भाग जाते। पांच सिंह के जत्थे ने सैकड़ों मुगलों को काल का ग्रास बना दिया। एक वीर योद्धा हजारों की सेना को एक साथ लेकर गिरता है। किंतु शत्रु सेना अत्यंत विशाल थी बड़े “साहिबजादा अजीत सिंह” को छोटे भाई साहिबजादा जुझार सिंह ने जब युद्ध भूमि में शहीद होते देखा तो उन्होंने भी गुरु महाराज से रणभूमि में जाने की आज्ञा मांगी। गुरु महाराज ने बालक जुझार सिंह की पीठ थपथपाई और अपने किशोर पुत्र को रणभूमि में चार अन्य से सिखों के साथ भेज दिया। गुरु महाराज अपने वीर जुझार सिंह को रणभूमि में शत्रुओं पर भारी पड़ते देखकर अत्यंत प्रसन्न होने लगे। “जुझार सिंह” शत्रु सेना के बीच गिर गए किंतु उन्होंने वीरता के जौहर दिखाते हुए वीरगति पाई। इन दोनों साहिबजादो की आयु मात्र 18 वर्ष तथा 14 वर्ष की थी। युद्ध भूमि में वर्षा और बादलों के कारण अंधेरा छाने लगा।

https://myrataul.com

अंधेरा होते ही युद्ध रुक गया गुरु महाराज ने दोनों साहिब जादू को शहीद होते देखकर ईश्वर के सामने धन्यवाद कहा और शुक्रराने की प्रार्थना की और कहा कि “तेरा तुझको सौंप दें क्या लागे मेरा” इस समय गुरु महाराज के पास मात्र 7 सिख सैनिक ही बचे थे। और वह कुल मिलाकर आठ की गिनती पूरी होती थी। मुगल सेना के पीछे हट कर आराम करने लगी उन्हें ऐसा लगता था कि गढ़ में बहुत बड़ी सिख सेना मौजूद है। इसके बाद गुरु महाराज ने सिखों को युद्ध भूमि में लाखों शत्रुओं को एक साथ परास्त करके शहीद होने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी ने सिर झुकाकर आदेश का पालन करते हुए प्राणों की आहुति देने की शपथ ली। किंतु उन्होंने गुरु महाराज से प्रार्थना की कि आप गढ़ छोड़कर अन्यत्र चले जाएं। क्योंकि हम मर गए तो कुछ नहीं बिगड़ेगा परंतु आप की शहीदी के बाद पंथ का क्या होगा। पर गुरु महाराज यूं कैसे युद्ध से मुंह मोड़ लेते गुरु महाराज ने सिंह को उत्तर दिया मेरा जीवन मेरे प्यारे सिखों के जीवन से मूल्यवान नहीं। यह कैसे संभव हो सकता है कि मैं तुम्हें रणभूमि में छोड़कर अकेला निकल जाऊं। अब तो मैं खुद दिन चढ़ते ही सबसे पहले अपना जथा लेकर रणभूमि में उतरूंगा। गुरुदेव के इस कथन से सिख बहुत चिंतित होने लगे। सिखों ने ठान लिया था कि कैसे भी करके सतगुरु को शहीद नहीं होने देंगे। वह जानते थे कि गुरु महाराज द्वारा दी गई सहादत इस समय पंथ के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगी। भाई दया सिंह जी ने एक ज़ुकती सोची अौर अपना अंतिम हथियार आजमाया। उन्होंने इस ज़ुकती के अंतर्गत सभी सिंह को विश्वास में लिया और उनको साथ लेकर पुण गुरुदेव के पास गए। और कहने लगे गुरु जी अब खालसा पंथ पांच प्यारे परमेश्वर रूप होकर आपको आदेश देते हैं कि कच्ची गढ़ी आप तुरंत त्याग दें और कहीं सुरक्षित स्थान पर चले जाए क्योंकि इस नीति में पंथ खालसा का भला है। गुरु महाराज ने पांच प्यारों का आदेश सुनते ही सिर झुका दिया। और कहा मैं अब कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता क्योंकि मुझे अपने गुरु की आज्ञा का पालन करना ही होगा गुरु महाराज ने कच्ची गढ़ी हवेली को त्यागने की योजना बनाई और 2 जवानों को अपने साथ चलने को कहा। बाकी पांच को अलग-अलग मोर्चों पर नियुक्त कर दिया। किंतु महाराज ने ठान रखा था कि यहां से प्रस्थान करते समय हम शत्रुओं को ललकारे क्योंकि चुपचाप शांत निकल जाना कायरता और कमजोरी का चुनाव माना जाएगा। और उन्होंने ऐसा ही किया देर रात गुरु महाराज अपने दोनों साथीयो दया सिंह तथा मानसिंह के साथ गढ़ से बाहर निकले। इस समय बूंदाबांदी थम चुकी थी और आकाश में कहीं-कहीं बादल छाए हुए थे। किंतु बिजली बार-बार चमक रही थी कुछ दूरी पर अभी पहुंचे ही थे कि बहुत तेज बिजली चमकी यहां से ऊंचे स्वर में आवाजे लगाई गई “पीर ए हिंद” जा रहा है किसी की हिम्मत है तो पकड़ ले। और साथ ही मसालों को तीर मारे गए जिससे उनकी सारी मसाले नीचे कीचड़ में गिरकर बुझ गई। और घोर अंधेरा छा गया। पुरस्कार के लालच में शत्रु सेना आवाज़ की तरफ भागी और आपस में ही टकरा टकरा कर मर गई। और यह नीति पूर्णता सफल रही।

अगली सुबह प्रकाश होने पर शत्रु सेना को भारी निराशा हुई क्योंकि हजारों असंख्य समूह में केवल 35 शव सिखों के थे। उनमें भी उनको गुरु महाराज कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। क्रोध को आतुर होकर शत्रु सेना ने गढ़ पर एक बार फिर आक्रमण कर दिया। असंख्य शत्रु सैनिकों के साथ लड़ते हुए अंदर के पांचों सिखों ने वीरगति पाई। मुगल सत्ता धारियों को यह करारी चपत लगी। कश्मीर लाहौर दिल्ली और सरहिंद की समस्त मुगल शक्ति 7 महीने आनंदपुर का घेरा डालने के बावजूद न तो गुरु साहब को पकड़ सके और ना ही सिखों से अपनी अधीनता स्वीकार करवा सके। सरकारी खजाने से लाखों रुपए खर्च हो गए हजारों की संख्या में फोजे मारी गई। पर मुगल अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त न कर सके।

“यह गर्दन कट तो सकती है मगर झुक नहीं सकती कभी चमकोर बोलेगा कभी सरहिंद की दीवारें बोलेगी”।

English translation by Google

Part-2

Mughal Jarnail Nahar Khan tried to climb the citadel by putting a CD, but Gurudev discriminated him with the same arrows. The Nawab of Sirhind gathered the forces once again and ordered him to attack the Kachhi Garhi Haveli with full force. But Guru Maharaj was in a strategic position, being in a high mound mansion. So they also thwarted this attack, the Sikh group came out of the stronghold and attacked the Mughal army. With the flag Kesari on the cart, Guru Maharaj himself was assisting his warriors by firing arrows at the enemies. There was a lot of iron on the building. Hundreds of enemy soldiers were late in the field. By the end all five Sikhs were also martyred. Once again Guru Maharaj sent the second batch of 5 Sikhs out of the Garhi to the battlefield. This batch also freed the sixes of the advancing enemies and pushed them back. And got Veeragati while doing great harm to the enemies. Thus Gurudev made a strategy and started sending 5-5 batches to the battlefield in turn. When the fifth batch was also martyred, it was noon.

As the sun rose to the forehead, following the instructions of Nawab Wazir Khan of Sirhind, 8 generals of the enemy army started marching towards the fort with their armies. Now Sikh soldiers felt that it would be difficult to stop such a big attack together. For this reason, the remaining Sikhs prayed to Guru Maharaj to leave the battle ground with Sahibzado. Hearing this, Guru Maharaj said to the Sikhs, which Sahibzados do you talk about. All of you are also my Sahibzade. Hearing this answer of Gurudev, everyone was surprised. Ajit Singh, the great son of Guru Maharaj, started asking father to order to go to the battlefield. Guru Maharaj immediately blessed and motivated him to fulfill his duty. The elder Sahibzada Ajit Singh had the courage to do something in his mind. What was it then? He went out of the house with his four other Sikhs and broke down on the army of the Mughals. Ajit Singh Jeedar escalated and the soldiers who came in front fell and ran away. The batch of five lions made hundreds of Mughals grass of Kaal. A valiant warrior falls with an army of thousands. But the enemy army was very large when the elder “Sahibzada Ajit Singh” was seen martyred in the battlefield by younger brother Sahibzada Jujhar Singh, he also asked Guru Maharaj to go to the battlefield. Guru Maharaj patted the boy Jujhar Singh and sent his teenage son to the battlefield along with four other Sikhs. Guru Maharaj became very happy to see his heroic Jujhar Singh falling heavily on the enemies in the battlefield. “Jujhar Singh” fell in the midst of the enemy army, but he found heroism showing valor. Both of these Sahibzados were only 18 years old and 14 years old. Darkness prevailed due to rain and clouds in the battlefield.

As soon as the war stopped, Guru Maharaj, seeing both the Sahib magic being martyred, thanked God in front of him and prayed to thank Shukra and said, “Let your hand be handed over to you.” Were. And that would have counted eight in total. The Mughal army retreated and began to relax and they felt that there was a very large Sikh army in the stronghold. After this Guru Maharaj encouraged the Sikhs to become martyrs by defeating millions of enemies together in the battlefield. They bowed their heads and took an oath to sacrifice their lives while following the order. But he prayed to Guru Maharaj that you leave the fort and go elsewhere. Because if we die nothing will deteriorate but what will happen to the cult after your martyrdom. But how did Guru Maharaj turn his face away from the war, Guru Maharaj replied to Singh, My life is not more valuable than the life of my dear Sikhs. How can it be possible that I leave you in the battlefield and leave alone. Now, as soon as I climb my day, I will first take my seat and get into the battlefield. Sikhs began to get very worried about this statement of Gurudev. The Sikhs were determined not to allow the Satguru to be martyred in any way. He knew that the harmony offered by Guru Maharaj would prove very harmful for the cult at this time. Bhai Daya Singh ji thought a blow and tried his last weapon. He took all the lions into confidence under this passion and went with them to Pun Gurudev. And the Guru started saying that as the Khalsa Panth, five beloved Gods, orders you to immediately abandon the raw fabric and go to a safe place because the Panth Khalsa is good in this policy. Guru Maharaj bowed his head as soon as he heard the order of the five loves. And said I can no longer resist because I have to follow my Guru’s orders Guru Maharaj planned to abandon the Kachchi Garhi mansion and asked 2 soldiers to go with him. The remaining five were appointed on different fronts. But Maharaj was determined that while leaving from here, we dare the enemies because quietly going out of silence will be considered a choice of cowardice and weakness. And they did the same late night when Guru Maharaj along with his two companions Daya Singh and Mansingh came out of the citadel. At this time the drizzle had stopped and the sky was cloudy at some places. But the lightning was shining again and again and some distance had just arrived that a very strong lightning flashed in a loud voice from here “Pir-e-Hind” is going. And at the same time the spices were shot with arrows, which caused all their spices to fall out into the mud. And there was complete darkness. In the greed for the prize, the enemy army ran towards the voice and collided with each other and died. And this policy completion was successful.

The next morning when the light came, the enemy army was disheartened as only 35 bodies were of Sikhs in a group of thousands. Even in them, Guru Maharaj could not be seen anywhere. Enraged, the enemy army attacked the stronghold once again. The five Sikhs inside, fighting with innumerable enemy soldiers, found heroism. The Mughal rulers found it difficult. All the Mughal power of Kashmir Lahore Delhi and Sirhind, despite having encircled Anandpur for 7 months, could neither capture Guru Sahib nor accept his subordination to the Sikhs. Thousands of rupees were spent from the state exchequer. But the Mughals could not achieve their goal.

“This neck can be cut, but cannot bend, sometimes it will shine brightly. Sometimes the walls of Sirhind will speak”.

admin

I'm Malkit singh rataul.

Leave a Reply

%d bloggers like this: